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क्यों बनायीं गयीं खजुराहों की मंदिरों में नग्न मूर्तियां ? 

क्यों बनायीं गयीं खजुराहों की मंदिरों में नग्न मूर्तियां ?

कलाकृति का उत्कृष्ट नमूना होने के बावजूद भी खजुराहों मंदिर की मूर्तियों के विषय में चर्चा करना भी अमर्यादित माना जाता है। इसके पीछे कारण है उन मूर्तियों का नग्न होना, सम्भोग की स्थिति को दर्शना। लेकिन खजुराहो मूर्तियों की नग्न पहचान वासस की मूर्तियों तक सीमित नहीं हैं क्यूंकि आज हम खुद को भले ही खुले विचारों वाला मानते हैं पर परन्तु बहुत हद तक समाज में महिला और पुरुष के बीच पनपने वाले आकर्षण को मान्यता भी मिलने लगी है लेकिन जब इन मूर्तियों का निर्माण हुआ था तब इन मूर्तियों की हालत वर्त्तमान हालत से पूरी तरह भिन्न थी। यह वह दौर था जब काम वासना से सम्बंधित कोई भी विषय सामाजिक तौर पर कहना, बोलना या करना निषेध था लेकिन इसके बावजूद खजुराहों के मंदिर में नग्न मूर्तियों का निर्माण हुआ। सदियों से यह एक अनसुलझी पहेली ही है कि खजुराहों की मूर्तियां कहना क्या चाहती हैं। अर्थात इन्हें बनाने के पीछे उद्देश्य क्या रहा होगा।

हिन्दू और जैन धर्म से सम्बंधित और प्रेरित खजुराहों की अधिकांश मंदिरों का निर्माण चन्देलों के शासन काल में ही हो गया था। दस्तावेजों के अनुसार १२वी शताब्दी में ८५ मंदिरों का अस्तित्व मौजूद था लेकिन समय के साथ साथ ये ध्वस्त होते गए और आज मात्र २० मंदिर ही शेष रह गए हैं। खजुराहों के मंदिर कला का एक अदभुत नमूना है जिसमें काम और सम्भोग की आकृतियां दर्शायी गयीं हैं।

सदियों से हमारे भारत में तांत्रिक साधना प्रचलित रही हैं। सदियों से अघोरियों और तांत्रिक लोगों ने अपनी साधना से अलग अलग सिद्धियां प्राप्त कीं हैं। खजुराहों की मूर्तियां भी इसी तंत्र और साधना के दौरान सम्भोग की मुद्राओं को दर्शा रहीं हैं। इन मूर्तियों के द्वारा तंत्र को अध्यात्म से जोड़ने का अभ्यास किया गया है और कुछ हद तक वे इनमें सफल भी रहे रहे हैं।

खजुराहों की मूर्तियों की सबसे खास बात ये है कि इनमें अत्यंत सम्भोग की अवस्थायों वाली प्रतिमाएं होने के बाद भी इनमें कुछ ऐसा नहीं हैं जिन्हें देखकर किसी की भी आँखें झुक जाएं। इन्हें देखकर कुछ ऐसा नहीं लगता कि इनमें कोई अभद्रता या अश्लीलता है बल्कि इन अदभुत प्रतिमाओं को देखकर आत्मिक और मानसिक सुकून का अनुभव होता है। खजुराहों की मूर्तियों का निर्माण भी उन्हीं लोगों ने किया जिन्होंने अध्यात्म से इनका अनुभव कर लिया था।

सामान्य व्यक्ति की धारणा है कि खजुराहों की मूर्तियों को देखकर व्यक्ति के भीतर वासना का प्रसार होता है। लेकिन असल बात यह है कि खजुराहों की मूर्तियां अगर कोई लगतार देखता रहे तो उसके मस्तिष्क के सभी विकार दूर हो जायेंगें। खजुराहों के मंदिरों का निर्माण करने वाले व्यक्तियों का भी यही मत था कि की यदि कोई इन प्रतिमाओं को शांत मन से देखे तो उसका अंतर्मन वासना शून्य हो जायेगा।

कुछ आलोचक खजुराहों की प्रतिमाओं को अभद्रता की हर सीमा पार करना मानते हैं और यह तक भी कहते हैं की इन सभी प्रतिमाओं पर गीली मिट्टी पुतवा देनी चाहिए। परन्तु वहीँ कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि खजुराहो जैसी मूर्तियां भारत के सभी मंदिरों में हो तो और किसी भी मंदिर की जरुरत नहीं पड़ेगी। ये इन्द्रिय मूर्तियां जीवन की पहली सीढ़ी, काम तृप्ति को पार करने का संकेत कराती हैं और यह भी बताती हैं कि जिस भी व्यक्ति ने अपने जीवन में इस पहले चरण को प्राप्त नहीं किया है वह देव दर्शन के पथ पर पावं धरने का अधिकारी नहीं है। साधना के आरम्भिक चरण में सर्वप्रथम बाधा काम वासना ही होती है। इन मूर्तियों की अध्यात्मिकता मन की इसी काम वासना को बहार निकालकर मनुष्य को जड़ से चेतन बना सकती है। ये मूर्तियां मनुष्य को उसके जीवन में मोक्ष और मन की शांति प्राप्त कर काम से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करती है।

 

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